राणा सांगा(1509-1528)
⇒मेवाड़ के वीरों में राणा सांगा का अद्वितीय स्थान है।
⇒राणा सांगा में गागरोन के युद्ध में मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय और खातोली के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित कर अपनी सैनिक योग्यता का परिचय दिया।
सांगा भारतीय इतिहास में हिंदूपत के नाम से विख्यात है।
⇒राणा सांगा खानवा के मैदान में राजपूतों का एक संघ बनाकर बाबर के विरुद्ध लड़ने आया था लेकिन पराजित हुआ।
⇒बाबर के श्रेष्ठ नेतृत्व एवं तोपखाना के कारण सांगा की पराजय हुई।
⇒खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527) परिणामों के दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण रहा।
⇒इससे राजसत्ता राजपूतों के हाथों से निकलकर मुगलों के हाथों में आ गई।
⇒यहीं से उत्तरी भारत का राजनीतिक संबंध मध्य एशियाई देशों से पुनः स्थापित हो गया।
⇒राणा सांगा अंतिम हिंदू राजा था, जिसके सेनापतित्त्व में सब राजपूत जातियां विदेशियों को भारत से निकालने के लिए सम्मिलित हुई।
⇒सांगा अपने देश के गौरव रक्षा में एक हाथ,एक आँख और टांग गवा दी थी।
⇒इसके अतिरिक्त उसके शरीर के भिन्न-भिन्न भागों पर 80 तलवार के घाव लगे हुए थे।
⇒सांगा ने अपने चरित्र और आत्म बल से उस जमाने में इस बात की पुष्टि कर दी थी कि उचित पद और चतुराई की अपेक्षा स्वदेश रक्षा और मानव धर्म का पालन करने की क्षमता का अधिक महत्व है।
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राणा कुंभा (1433-1468)
⇒मोकल के पुत्र राणा कुंभा (1433-1468) मेवाड़ में राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए जाना जाता है।
⇒कुंभा को अभिनवभरताचार्य, हिंदू सुरताण,चापगुरु, दान गुरु आदि विरुदों से संबोधित किया जाता था।
⇒राणा कुंभा ने 1437 में सारंगपुर के युद्ध में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को पराजित किया था।
⇒इस विजय के उपलक्ष्य में कुंभा ने अपने आराध्य देव विष्णु के निमित्त चित्तौड़गढ़ में कीर्ति स्तंभ (विजय स्तंभ) का निर्माण करवाया।
⇒कुंभा ने मेवाड़ की सुरक्षा के उद्देश्य से 32 किलो का निर्माण करवाया था, जिनमें बसंती दुर्ग, मचान दुर्ग,अचलगढ, कुंभलगढ़ दुर्ग प्रमुख है।
⇒कुंभलगढ़ दुर्ग का सबसे ऊंचा भाग कटारगढ़ कहलाता है।
⇒कुंभाकालीन स्थापत्य में मंदिरों का बड़ा महत्व है।
⇒ऐसे मंदिरों में कुंभ स्वामी तथा श्रंगारचौरी का मंदिर (चित्तौड़),मीरां मंदिर (एकलिंग जी), रणकपुर का मंदिर अनूठे हैं।
⇒कुंभा वीर, युद्ध कुशल, कला प्रेमी के साथ साथ विद्वान एवं विद्यानुरागी भी था।
⇒एकलिंग महात्मय से ज्ञात होता है कि कुंभा वेद, स्मृति मिमासा, उपनिषद्, व्याकरण, साहित्य ,राजनीति में बड़ा निपुण था।
⇒संगीत राज, संगीत मीमांसा सुड प्रबंध कुंभा द्वारा रचित संगीत ग्रंथ थे।
⇒कुम्भा ने चण्डीशतक की व्याख्या, गीत गोविंद की रसिकप्रिया टीका और संगीत रत्नाकर की टीका लिखी थी। ⇒कुंभा का दरबार विद्वानों की शरणस्थली था।
⇒उस के दरबार में मंडन कविअत्री और महेश, कान्ह व्यास इत्यादि थी।
⇒अत्रि और महेश ने कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति की रचना की तथा कान्ह व्यास ने एकलिंग महात्य नामक ग्रंथ की रचना की।
⇒इस प्रकार कुंभा के काल में मेवाड़ सर्वतोंमुखी उन्नति पर पहुंच गया था।
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